यह क्या हो रहा है जीवन दाताओं के साथ-
जैसे किसान को अन्नदाता कहते है ठीक वैसे ही डॉक्टर को जीवन दाता कहते है- किसान अपनी तरफ से पूरी मेहनत करता है पर फसल के अनुसार मौसम अगर साथ नही देता तो क्या किसान दोषी हो गया--
क्या अन्नदाता पर हम सवाल करेंगे--क्या हम उन पर घात करेंगे
नही न--
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ठीक उसी तरह से डॉक्टर रोगी को बचाने की हर सम्भव कोशिश करता है पर उसका शरीर किसी भी तरह की दवाई,इलाज को सकारात्मक ग्रहण नही करता है या वो जब हॉस्पिटल लाया जाता है तब तक उसकी स्थिति बेकाबू सी हो जाती है--और डॉक्टर्स की अथक मेहनत के बाद भी अगर वो रोगी बच नही पाता तो क्या हम उस डॉक्टर पर घात करेंगे--उसके सम्मान पर प्रहार करेंगे--
डॉक्टर जीवन दाता कहे जाते है पर जीवन उनके हाथ मे नही होता--उनके हाथ मे रोग की स्थिति के अनुसार अपनी बुद्धि व विवेक के अनुसार इलाज होता है-वो दिल का प्रत्यारोपण तो कर सकते है पर जिस दिल को ईश्वर बन्द कर देता है उसको वो चला नही सकते।
यह अत्यंत दर्द का विषय है जब कोई परिवार अपने प्रियजन को खो देता है --उस परिवार की व्यथा का बयान नही किया जा सकता पर रोगी को न बचा पाने का दर्द तो डॉक्टर को भी होता होगा यह अलग बात है कि उसकी व हमारी मानसिक स्थिति में फर्क होता है क्योकि डॉक्टर अपने कर्म क्षेत्र से ही मौत और जिंदगी के बीच मे रहता है तो स्वाभाविक है कि उसका ह्रदय यह सब देखते कठोर भी हो जाता होगा पर किसी की मौत डॉक्टर को भी तो अच्छी नही लगेगी न--कौन डॉक्टर चाहेगा कि उसके हाथ मे आया केस खराब हो जाये!
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अगर सही रूप से कार्य करने वाले डॉक्टर मरीज को अपनी पूरी कोशिश के बाद भी न बचा पाए तो क्या उन पर प्रहार करना उचित है--क्या भीड़ जुटा कर उसके सम्मान पर आघात करना जायज है। क्या हिंसक उन्माद जायज है ये कुछ सवाल है जो अपना जवाब मांग रहे है---दर्द हरने वाले डॉक्टर्स अपनी व्यथा के हालात बता रहे है -हिंसक पर हिंसक घटनाएं क्रमश: होती जा रही है और डॉक्टर्स खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे है।अगर डॉक्टर्स के विश्वास को हमने तोड़ दिया तो वो कारगर इलाज फिर कैसे कर पाएंगे।
कुछ खबरे डॉक्टर्स,हॉस्पिटल्स की अमानवीयता की भी आती है जिस पर गुस्सा स्वाभाविक है पर उसके लिए कानूनी कार्रवाई के रास्ते होने चाहिए न कि हिंसा के।जो इंसानियत के साथ मजाक कर रहे है उनका रिजस्ट्रेशन रद्द हो-उन्हें सजा मिले पर हिंसा की कार्रवाई नही होनी चाहिए।
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कुछ गलत लोगो की वजह से अगर अच्छे लोगो को भी हम संदेह की स्थिति में ले आएंगे और उनको दबाब में रखेंगे तब वो न तो सही इलाज कर पाएंगे और न ही अपने ही इलाज पर उन्हें खुद को विश्वास होगा क्योकि लटकती तलवार का डर उन्हें सही इलाज करने ही नही देगा--वे क्यो जोखिम लेंगे जब उनकी जान को खतरा रहेगा।
देश के विभिन्न स्थानों,शहरों से ऐसी अमानवीय घटनाएं अक्सर सुनने में आती है -बंगाल में ऐसी घटनाएं अक्सर सुनने पढ़ने को आती है अभी 1-2 दिन पहले हुई हिंसक घटना ने सभ्य समाज की संस्कृति पर जो आघात किया है वो हमे सोचने को मजबूर करती है कि रोग से मुक्ति देने वाले इस वर्ग को हम ये क्या दे रहे है!
अब जब डॉक्टर्स हड़ताल पर चले गए तब न जाने कितनी जिंदगियां खतरे में आ गई है पर इसके लिए वे डॉक्टर्स दोषी नही-हम दोषी है क्योकि हिंसक वातावरण में कोई कार्य नही कर सकता।गलत को कानूनी दण्ड तक लाया जाए-हिंसक गतिविधि स्वीकार्य नही होनी चाहिए।डॉक्टर्स पर प्रहार करने वालो को कड़ी सजा तय हो तथा डॉक्टर्स के सम्मान व उनकी जान की सुरक्षा निश्चित हो।
जीवनदाता की महत्ता को समझिए--ये भी तो हमारे समाज से ही है इनके साथ यह व्यवहार क्यो--इनके जीवन ,परिवार को भी समझना होगा--मानवीयता के पक्ष से डॉक्टर्स के पेशे का आंकलन भले ही कीजिये पर व्यवसायिक पक्ष को भी हम नकार नही सकते--उनका भी अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने का दायित्व है।अनैतिकता,लूट पर प्रश्न जरूर हो पर वो कानूनी रूप से कार्रवाई के रूप में हो--हिंसक कार्रवाई नही होनी चाहिए।
समाज,प्रशासन व सरकार का दायित्व बनता है कि डॉक्टर्स को भयमुक्त वातावरण प्रदान करे तथा उनके सम्मान की सुरक्षा पर उचित निर्णय ले ताकि डॉक्टर्स बेहिचक अपने दायित्व को तन्मयता के साथ निभा सके।
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