सियासत की शतरंज यहां देखिए-
हम लोग अक्सर राजनेताओं को ही उल्टी सीधी राजनीति की कुटिल चालों के लिए कोसते है पर अब हमें उन पर अंगुली उठाने से पहले अपने अपने सामाजिक परिवेश व उनमें चल रही राजनीति की उठापटक को पहले देख लेना चाहिए।हमारे अपनो ने कुटिलता में राजनेताओं को मात दे दी है उन पर गर्व कीजिये और हो सके तो उनका अभिनंदन कीजिये।
शर्म से सर झुक जाता है जब समाज के कुछ मौजिज लोग व अध्यात्म के पथिक मिल कर अपना एकाधिकार की सत्ता बनाने की कोशिश में लगे रहते है तब धर्म वालो से धर्म छूट जाता है और समाज वालो से समाज छूट जाता है और बनती है नित नई संस्थाएं,ट्रस्ट बोर्ड,एक के ऊपर एक सभाओं की फाइल वाली इमारतें।
इन लोगो को सामाजिक विसंगतियों की चिंता नही है और न ही समाज के आम जन की तकलीफों का ज्ञान है बस एक ही नशा है कि समूचा समाज अर्थात सभी संस्थाओ की चल अचल संपत्ति इनकी मुट्ठी में आ जाये।
ये लोग लोकतंत्र का मजाक उड़ाने में भी पीछे नही रहते-समाज की बहन,बहु,बेटी जब नामांकन करना चाहती है तो उसको प्रत्याशी होने का अवसर नही देते और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से प्रचंड बहुमत से जीते हुए व्यक्ति को श्रद्धा आस्था इंगित का दबाब से त्यागपत्र दिलवाने की कोशिश करते है और बात यहां भी नही बनती तो फिर पूरी संस्था की मान्यता तक खत्म करने की धमकी दे देते है।
अब सवाल है कि सामाजिकता में इस तरह की सियासत का तांडव क्यो!
सवाल यह है कि पांच महाव्रत धारियों को इन सियासती विषयों पर आसक्ति क्यो?
अगर धर्म नैतिकता का पथ है और आध्यात्मिक पथिक उसको मार्गदर्शित करने वाली महान आत्माएं है तब फिर यह खुल्लम खुल्ला अनैतिकता का माहौल क्यो!
इंगित गलत को रोकने में क्यो नही आता---इंगित सत्य की स्वीकृति क्यो नही बनता!आध्यात्मिक पथिकों का अध्यात्म में मन जब नही लगे तब वो सभा संस्थाओं की पंचायती में मन लगाते है--उनके लिए मनन करने का वक्त है कि क्या घर-संसार इंगित की ध्वजा फहराने छोड़ा था या फिर आत्मकल्याण करते हुए मानवता का कल्याण करने के लिए।
अगर राजनीति ही करनी है तो फिर आध्यात्मिक परिवेश को तो दूषित मत कीजिये--
यह सच है कि हमारी प्राचीन संस्कृति अध्यात्म की रही है पर उससे बड़ा सच यह है कि अब कुछ अपवादों को छोड़कर अध्यात्म के क्षेत्र में इस परिवेश का लाभ उठाकर सियासत का दंगल करने वाले आ गए है और अफसोस इससे भी अधिक यह है कि बेचारी भोली जनता तथाकथित सियासती दंगल करने करवाने वालो ,पाखंडियों के पास मंगल खोजने आती है।
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