क्या प्रियंका सचमूच मोदी की वापसी के लिए वरदान बन गई है?
जब प्रियंका को अचानक से उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई थी तब राहुल गांधी की दूरदर्शिता की तारीफ भी तुरंत होने लग गई थी क्योकि प्रियंका के ताजगी भरे फोटोजनिक चेहरे से कांग्रेस के खोए मनोबल को पाने की संभावनाओं को तब बड़ा बल भी मिल गया और यह कहा भी जाने लगा था कि अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के उत्साह को पंख लग जायेंगे।एक बारगी तो भाजपा के खेमे में भी जरूर घमासान मचा होगा पर जैसे जैसे राजनीतिक समीकरणों की पड़ताल होने लगी वैसे वैसे भाजपा शायद राहुल का आभार व्यक्त करने लगी होगी।
राहुल ने यह ब्रह्मास्त्र सपा- बसपा के गठबंधन पर कांग्रेस को नजरअंदाज करने के गुस्से से ही चलाया होगा और उसका त्वरित प्रभाव भी पड़ा था जब अखिलेश ने कांग्रेस को साथ लेने व कुछ सीटें देने का फार्मूला भी बनाया पर मायावती जी की जिद के चलते यह गठजोड़ होते होते रह गया।
कांग्रेस के खेमे का उत्साह प्रियंका की उपस्थिति से बढ़ा है वो कांग्रेस की सीटों का इजाफा कितना करेगा इसमे संदेह है पर कांग्रेस कही न कही मुस्लिम व दलित वोट बैंक को हथियाने में कामयाब जो रहेगी उसका सीधा नुकसान सपा व बसपा के गठजोड़ को पड़ने से इनकार नही किया जा सकता।
शायद तभी यह कहा जा रहा है कि प्रियंका की सक्रियता की वजह से भाजपा उत्तरप्रदेश में बड़े संभावित नुकसान से वोटों की छितरन की वजह से बच गई अन्यथा भाजपा के लिए दिल्ली दूर ही हो जाती पर अब कांग्रेस की मजबूती भाजपा के लिए जीवनदान बन रही है क्योकि बुआ बबुआ के वोट कांग्रेस कुछ अपने खेमे में ला रही है और भाजपा को पतली गली से अपनी सीट निकालने का अवसर मिल रहा है।
दुश्मन की दुश्मनी में भी वक्त दोस्ती के परिणाम कैसे दे देता है यह उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति खूब बता रही है।
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