अप्रत्याशित चुनाव परिणाम दे सकता है बंगाल

  • मोदी ओर शाह की मजबूत घेराबंदी में ममता
  • बंगाल की हवा का स्वभाव बदला बदला
  • विभीषण यहां भी लंका ढहा रहा है
  • सुरक्षित सीट हावड़ा भी कड़ी टक्कर में
  • मुस्लिम तुष्टिकरण से गेर मुस्लिम मतदाता खफा
  • ममता का मोदी विरोध बंगाल को रास नही आ रहा
  • वाम का लाल भी बैकडोर से भगवा खिलाने में लगा
  • विपक्ष के महागठबंधन का नेतृत्व करने के अरमान पर चोट
  • भाजपा के लिए फिर वरदान बने राम
  • जय श्री राम के उद्घोष पर ममता का संयम चुका


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बंगाल का नाम आते है क्रांति की सुगंध का अहसास हो जाता है।एक समय था जब बंगाल के बारे में कहा जाता था कि दिल्ली जो 20 वर्ष बाद सोचती थी उसको बंगाल 20 वर्ष पहले सोच लेता था।

बंगाल जिसने कांग्रेस को राज का अवसर दिया फिर लेफ्ट अर्थात वाम सरकारों के कई दशक रहे अभी दीदी की पारी चल रही है जो लगभग एक दशक से राज कर रही है पर 2019 के इन लोकसभा चुनाव में बंगाल की हवा में एक अलग तरह का करंट है और उस करंट के अंदर की बिजली को ममता दीदी शायद भांप चुकी है इसलिए वो तनाव में है और इस तनाव को जनता के सामने आने से बचाने के लिए वे अतिरिक्त जोश व कभी पलटवार बयान तो कभी धमकी के अंदाज से यह जता रही है कि बंगाल में उनका ही दबदबा कायम रहने वाला है।

बंगाल में लोकसभा की 42 सीट में से एक तरफा 34 सीट ममता दीदी के खाते में 2014 में रही है इसलिए इस बदली हवा में ममता जी के लिए अपने इस अभेद दुर्ग को बचाने की सबसे बड़ी चिन्ता है।मोदी के खिलाफ समूचे विपक्ष को एक जुट करने में दिन रात एक करने वाली ममता के सामने मुश्किल यह है कि जिनसे उसने सत्ता छिनी थी उनके नेता भले ही दिल्ली में मोदी को हटाने की बात कर रहे हो पर उनके बंगाल के कैडर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का साथ देकर ममता के दुर्ग को हिलाने में लगे है।
भले ही बंगाल में वाम मोर्चा की राजनीतिक ताकत नदारद दिखे पर वाम के संगठन की तुलना में आज भी कोई पार्टी उसका मुकाबिला नही कर सकती। इसलिए वाम के संगठन का अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग भाजपा की क्रेन को तृणमूल का किला ध्वस्त करने की कितनी ताकत दे सकता है यह अनुमान सहज ही किया जा सकता है।

जिस तरह से भाजपा उत्तरप्रदेश में अपने दुर्ग को बचाने के लिए चिंतित है कुछ इसी तरह ममता बंगाल में अपनी जमीन को बचाने के लिए तनाव में है क्योकि भाजपा सधे कदमों से उसकी जमीन का भगवाकरण करने के लिए आगे बढ़ती आ रही है।अगर ममता के हाथ से बंगाल की 30 प्रतिशत ही जमीन निकल गयी तो ममता के लिए आने वाले दिनों में विपक्ष को एक साथ करके सत्ता में लाने व उसका नेतृत्व करने का सपना तो ध्वस्त होगा ही पर बंगाल में भी उनकी सत्ता खतरे में पड़ जाएगी।चुनाव के 3 चरण के बाद चुनाव आयोग ने बंगाल में जिस तरह से केंद्र वाहिनी का उपयोग निष्पक्ष चुनाव के लिए किया है उससे भी जमीन बचाने की दूसरी कोशिशों पर प्रहार हुआ है।

जो ख़ौफ़ कभी वाम के समय हुआ करता था वो दीदी के समय मे भी दिखता है और उसका असर मतदाताओं को कुछ हद तक प्रभावित भी कर सकता है पर भाजपा के खेमे में मुकुल रॉय के रूप में दीदी का एक खास इक्का आने और उनकी बदौलत दीदी के मजबूत किले के कुछ पत्थर सरकने का असर अब दीदी को भी महसूस होने लग गया है।अर्थात विभीषण किस तरह से लंका ढहा सकता है अब धीरे धीरे ही सही पर ममता को समझ मे आ जरूर रहा होगा।

बंगाल की बदली हवा का असर हावड़ा संसदीय सीट को एक उदाहरण के रूप में समझ सकते है क्योकि दीदी का कार्यालय नवान्न हावड़ा के ह्रदय स्थल स्थल पर है और यही बैठ कर दीदी सारे निर्णय लेती है और यह तृणमूल की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक कही जाती है ।इस सीट पर सांसद प्रसून बनर्जी दूसरी बार खेल रहे है और वे बिना किसी संशय के विजयी माने जा रहे थे और जब भाजपा के उम्मीदवार की घोषणा हुई तो एक अनजान से नाम के आने के बाद तो प्रसून बनर्जी की विजय का अंतर बढ़ा हुआ माना जा रहा था पर बंगाल में बदली सियासी हवा का ही असर या करंट कहिये कि यहां ममता दीदी को अधिक वक्त देना पड़ा है और पांव पांव चलना भी पड़ा है।

हावड़ा में 6 मई को चुनाव हो गए है और अब चुनाव के बाद जो समीकरण बन रहा है उसमें हावड़ा से भी अप्रत्याशित परिणाम आने की उम्मीद जमीनी सतह पर सियासत को देखने व कार्य करने वाले लोग कर रहे है।जब हावड़ा की सीट इस बदलाव के चमत्कार का परिणाम देने की टक्कर में आ गई है जो कि तृणमूल का गढ़ कही जा सकती है तब बंगाल की उन सीटों पर प्रभाव क्या पड़ेगा जहां गेर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है। सबसे बड़ी बात यह भी है कि बंगाली समुदाय के मन की अकुलाहट बंगाल में सत्ता परिवर्तन के रूप में दिख रही है भले ही कुछ लोग दीदी को बंगाल और मोदी को दिल्ली सौंपने की बात करते हो पर जब दीदी को मोदी हटाओ की भीड़ का नेतृत्व करते देखते है तब दीदी के प्रति बंगाल से भी उनकी भावनाएं बदलती प्रतीत होती है।

बंगाल का मतदाता खुल कर बोलता नही दिखता पर वो संकेतो से चुप चाप कमल छाप वाली राह बता कर निकल जाता है।यहां भाजपा का जमीनी स्तर पर संगठन भले ही मजबूत नही है पर भाजपा को मोदी ब्रांड का लाभ चमत्कारिक रूप से हो रहा है और बंगाल की जनता मोदी जी की रैलियों में जिस तरह से उमड़ती दिखी है उससे मजबूत संगठन के बिना भी जनता के समर्थन से भाजपा ममता दीदी को आमने सामने की चुनोती देती नजर आ रही है।

बंगाल में भाजपा का विधिवत प्रवेश तो तब से ही हो गया था जब 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनी थी और इधर बंगाल में तृणमूल भी रिकॉर्ड 34 सीट लेकर आई थी तब तृणमूल कैडर ने अपना शक्ति प्रदर्शन वाम व कांग्रेस के विरुद्ध विशेष किया था उस वक्त वाम के कई क्लबों ने अपने बचाव के लिए कमल का झंडा लगा दिया था।चूंकि केंद्र में मोदी अर्थात भाजपा आ गए थे तो भाजपा के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन इतना आसान नही था और विपक्ष की दूसरी पार्टियों के लिए उस वक्त यह सुरक्षा कवच का उपाय बन गया था।पंचायत चुनाव की हिंसा व आतंक के माहौल में भी भाजपा बिना मजबूत संगठन के दूसरे नंबर पर थी और उस वक्त की भी खबरें यह कह रही थी कि चुनावी पर्चा भरने के लिए वाम के कैडर भाजपा के जुलूस में उनके पीछे पीछे चल रहे थे अर्थात बचाव के लिए भाजपा उस वक्त भी सुरक्षा कवच बनी थी।

भाजपा का वाम दलों के इतने बड़े संगठन के होने व उनके चार दशकों तक राज करने के बाद भी मुख्य विपक्ष ममता का बन जाना क्या कम अप्रत्याशित था! उस वक्त भी लोग सोचते रह गए थे कि इतनी तेज रप्तार से भाजपा बंगाल में 2 नंबर पर आ गई है तब 1 नंबर पर भी तो काबिज हो सकती है। शायद इसलिए इस बार के चुनाव में बंगाल अप्रत्याशित उलटफेर के परिणाम दे दे तो आश्चर्य नही होना चाहिए ।
अभी का माहौल यह जता रहा है कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने ममता की घेराबंदी असरदार करने में कोई कसर नही छोड़ी है इसका लाभ बंगाल की जमीन से अधिकतम कितना ले पाएंगे यह 23 मई को जब वोट का पिटारा खुलेगा तब पता चलेगा पर भाजपा की बढ़त जितनी होगी उतना ही नुकसान ममता का होगा क्योकि कांग्रेस और वाम के पास खोने के लिए कुछ विशेष नही है। अगर इस माहौल में भी ममता अपनी जमीन 1- 2 इंच खो कर भी शेष बचा लेती है तो फिर यह भी किसी चमत्कार से कम नही होगा। पर बंगाल की हवा ममता के लिए इस चुनोती को आसान नही बता रही अर्थात बंगाल से बड़ा उलट फेर चुनाव परिणामो में देखने को मिलने के आसार प्रबल है।कुल मिलाकर बंगाल में चुनावी माहौल और अंदर की हवा यह आभास करवा रही है कि भाजपा ममता के सामने बराबरी पर खड़ी हुई है अर्थात 2014 की 2 सीटों की तुलना में वो डबल डिजिट का आंकड़ा लाती प्रतीत हो रही है।जहां तक बंगाल की जनता के मन मे ममता बनर्जी के प्रति सवाल है - ममता दीदी के क्रांतिकारी व्यक्तित्व को बंगाल की जनता मन से स्वीकार करती है और उनकी कड़ी मेहनत व लगन को भी मानती है और इसलिए कई बार लोग यह भी कह देते है कि मोदी और ममता दोनों अगर साथ चले तो देश के लिए बहुत अच्छा कर सकते है क्योकि दोनों ही मेहनती व निडर व्यक्तित्व के मालिक है पर जन मानस को दीदी की तुष्टिकरण की नीति से बड़ी शिकायत हो रही लगती है।

अब इसमें जय श्री राम के नारे पर ममता दीदी के दुआरा की गई प्रतिक्रिया का प्रभाव शेष दो चरण की उन सीटों पर विशेष पड़ने की संभावना बताई जाती है जहाँ गेर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बराबर या अधिक है।इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत के हद पार कर जाने के रूप में देखा जा रहा है और भाजपा के लिए राम यहां वरदान से बन गए है।

PLEASE LIKE SHARE FOLLOW....संजय बाफना(सनम)

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