सिरियारी से---अब तो जग जाइये!

जब जब सामाजिक मुद्दे अदालत की देहरी पर जाते है तब तब वे विवाद के रूप में अधिक प्रचारित हो जाते है।
जब जब अदालत का फैसला आता है तब तब सम्बद्ध पक्ष अपने अपने तरीकों से उस पर विवेचन करते हुए समाज के सामने रखते है।
सवाल यह है कि क्या सामाजिक मुद्दे अदालतों में जाने चाहिए?
क्या उनका निपटारा सामाजिक जाजम पर मिल बैठ कर नही होना चाहिए?
इनका नकारात्मक प्रभाव समाज पर कितना पड़ता है?
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SANJAYSANAM
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