सुराणा जी को लेकर जिस तरह से एक संदेश उन पर प्रहार के रूप में पिछले 1-2दिन से चल रहा है उससे यह सवाल खड़े होते है कि किसी पर कीचड़ उछालने के लिए लोग कही से भी उठा लेते है और उसके नाम पर लगा देते है।
डांस बार ,शराब और शबाब, मांसाहारी व्यंजनों की दुकानें, व इससे भी बढ़कर कत्ल खाने चलाने वालों की एक बड़ी जमात हमारे जैन समाज में है।
कत्ल खाने तो मौत के कारखाने है और एक बड़ी तादाद इनमें जैनियों की है---भगवान महावीर की अहिंसा को मानने वाले अगर हिंसा के उद्योग चला रहे हो तो प्रश्न तो विचारणीय है पर समाज को धन चाहिए वो चाहे मौत के उद्योग से आये और शराब और शबाब की दुकानों से आये---तब सब अच्छे लगते है जब वो समाज के प्रकल्पों में आर्थिक योगदान देते है।
तब कत्लखाने भी अच्छे है और शबाब से रंगारंग शराब के वे पैमाने भी अच्छे लगते है।
मौत के कारखानों पर ओर मांस की दुकानों रेस्टोरेंटों पर जब हम चुप है तब शराब और शबाब की दुकानों पर प्रश्न खड़े ही नही रहते।
जो चलाते है उनसे सवाल फिर भी नही होता पर जो खुद नही चलाता पर उसकी भाड़े की प्रॉपर्टी पर कोई और चलाता है तब नाम उसका तुरन्त ले लिया जाता है---उन लोंगो को यह असलियत भी मालूम ही होगी पर उनके जिम्मे में कीचड़ उछालने का कार्य आया हुआ है इसलिए बेकारण भी उनको उछालना है।-
गुनाह पर सवाल हो तो जायज लगते है पर जिसका उस प्रकरण से सीधा वास्ता नही उस पर भी गर यह आरोप लगा दे तो सीमित समय का उनका एक मकसद पूरा हो जाता है ।
दीर्धकालिक तो वे भी जानते है कि तमाचा खाना ही है पर अल्पकालिक गर कुछ कर सके जैसे पाकिस्तान करता है ठीक उसी तर्ज पर यह किया गया।
सुराणा जी की सर्जिकल स्ट्राइक जो संभवतया उन्होंने रोक रखी थी उसका रास्ता अब बन रहा है।
अब सुराणा कड़े निर्णय लेने को मजबूर होंगे और कोमल भावना से उनको बाहर आने के लिए ऐसे प्रकरण खुद रास्ता बनाएंगे।
इस प्रकरण में सिर्फ अराजक तत्वों का दोष नही है -बल्कि यह एक सुनियोजित रणनीति के तहत हुआ है क्योंकि सिरियारी ने इंगित को जो पटकनी दी थी वो दर्द शायद भुला नही जा रहा।
खैर---फैसला वक्त को करना है एक तरफ सांवरा है दूसरी तरफ इंगित का पहरा है।
काउंट डाउन शुरू हो गया हो तो आश्चर्य नही करना चाहिए---क्योंकि सांवरे आचार्य भिक्षु की सिरियारी से जाने कब तेरस पर हुई इंगित की कार्रवाई पर फैसला आ जाये।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
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