मुनि श्री कुमार श्रमण जी
आपका उदबोधन आज सुना और वक्तुत्व शैली की अनुशंसा करता हूँ।
तेरापंथ के प्रति गर्व के साथ आपने राग द्वेष के प्रसंगों को न सिर्फ छूआ बल्कि इंगित औऱ श्रद्धा के नाम पर सच को पूछने ,जानने व लिखने पर प्रहार किया---
यह अंदाज साधर्मिक नही बल्कि सियासत के उस नेता जैसे था जो चुनावी प्रचार के दौरान दूसरी पार्टियों पर करता है।
यह अंदाज साधर्मिक नही बल्कि सियासत के उस नेता जैसे था जो चुनावी प्रचार के दौरान दूसरी पार्टियों पर करता है।
आपने सिरियारी प्रकरण को संकेत से कहा व मीनाक्षी बुच्चा प्रकरण पर भी आप चालाकी से साधु-साध्वी पर दोषारोपण की बात कह गए।
आपने निंदक,आलोचक का मुंह बंद करने के लिए निगोद नर्क की बात आचार्य तुलसी प्रसंग का जिक्र करते हुए कही।
आपने निंदक,आलोचक का मुंह बंद करने के लिए निगोद नर्क की बात आचार्य तुलसी प्रसंग का जिक्र करते हुए कही।
सच उठाने या आपकी भाषा मे निंदा करने वालो को आपने काली हांडियों की संज्ञा दी जो नजर नही लगने देती।
फिर भी आप लोंगो को यह सावधान करते दिखे कि जिस समूह से सच का सवाल आपके नजरिये से निंदा की बात आये उस समूह को छोड़ दे।
फिर भी आप लोंगो को यह सावधान करते दिखे कि जिस समूह से सच का सवाल आपके नजरिये से निंदा की बात आये उस समूह को छोड़ दे।
क्यो कुमार श्रमण जी?
काली हांडियों से तो नजर का बचाव होता है न फिर जहा वो हो वहां से आप आम श्रावको को समूह छोड़ देने की बात क्यो कह रहे है?
आपने जिनको काली हंडिया कहा है वो सिर्फ नजर का बचाव नही बल्कि उसूलों का भी बचाव है।
काली हांडियों से तो नजर का बचाव होता है न फिर जहा वो हो वहां से आप आम श्रावको को समूह छोड़ देने की बात क्यो कह रहे है?
आपने जिनको काली हंडिया कहा है वो सिर्फ नजर का बचाव नही बल्कि उसूलों का भी बचाव है।
शालीनता से किया गया सच का बयान क्रांति का आगाज है और रोकने से पानी नही रुकता क्योकि प्रवाह औऱ जमीन का ढलाव उसको गतिमान रखता है।
आप जिनको निंदक समझ कर अपनी तरफ से उपमाएं दे रहे है वे आचार्य भिक्षु के आदर्शों को आज के हालातों से तोल रहे है-सच का आईना दिखा रहे है।
तेरापंथ के प्रति मान व गर्व उनके मन मे आपसे कही कम नही है पर इस गर्व पर विसंगतियों के मुखोटे वो बता रहे है जो आप जान तो रहे है पर मान नही रहे।
कुमार श्रमण जी
आप लोग साधना राह के पथिक है पर माफ कीजियेगा मुनिवर आपके भाव मे राग भी ,द्वेष भी,ममकार भी,प्रहार भी औऱ सियासत की कुटिल चाल भी समाहित है।
आप अच्छे वक्ता है,शब्द संयोजन में कुशल है -इस बौद्धिकता का उपयोग काश आपने अंतर को पाटने में किया होता तब आपकी जुबान से तेरापंथ समाज का यह वर्गीकरण नही होता।
औऱ न ही आपकी अभिव्यक्ति में विरोधाभास होता ---एक तरफ आप निंदक को पास रखने के लिए कबीर को उद्धत करते दिखते दूसरी तरफ श्रावक को व्हाट्स एप समूह से निकलने की हिदायत देते नही दिखते।
मुनि जी
आपके अंदर संभावनाओं से इंकार नही करता पर आप जिस जमीन पर खड़े है और जिसके लिए आपने घर बार छोड़ा है उसके लिए सही रूप से अपनी ऊर्जा लगाए जिससे धर्म संघ की यह ईमारत बिना किसी दाग धब्बे के लिए हम सबको गर्वित करती रहे।
आप लोग साधना राह के पथिक है पर माफ कीजियेगा मुनिवर आपके भाव मे राग भी ,द्वेष भी,ममकार भी,प्रहार भी औऱ सियासत की कुटिल चाल भी समाहित है।
आप अच्छे वक्ता है,शब्द संयोजन में कुशल है -इस बौद्धिकता का उपयोग काश आपने अंतर को पाटने में किया होता तब आपकी जुबान से तेरापंथ समाज का यह वर्गीकरण नही होता।
औऱ न ही आपकी अभिव्यक्ति में विरोधाभास होता ---एक तरफ आप निंदक को पास रखने के लिए कबीर को उद्धत करते दिखते दूसरी तरफ श्रावक को व्हाट्स एप समूह से निकलने की हिदायत देते नही दिखते।
मुनि जी
आपके अंदर संभावनाओं से इंकार नही करता पर आप जिस जमीन पर खड़े है और जिसके लिए आपने घर बार छोड़ा है उसके लिए सही रूप से अपनी ऊर्जा लगाए जिससे धर्म संघ की यह ईमारत बिना किसी दाग धब्बे के लिए हम सबको गर्वित करती रहे।
आपके शब्दों में छिपे भावो का विवेचन अगर किया जाए तो बहुत लिखा जा सकता है पर मेरी मानसिकता सिर्फ सवाल उठाने की नही बल्कि एक विचारवान ,बौद्धिक व्यक्तित्व को यह निवेदित करने की है कि साधना के पथिक सियासती शतरंज बिछाते और पदों पर चढ़ाते उतारते नजीर नही बनते बल्कि सफेदी के परिधानों से अधिक अपनी आत्मा को धवल रखते हुए आलोचक औऱ प्रशंसक में भेद नही करते।
मुनिवर
आपने श्रावको को आलोचना के संदेशों को आगे फारवर्ड न करने व जरूरत पड़ने पर समूह से बाहर निकलने का निर्देश दिया---
पर आप तथा अन्य मुनि इन संदेशों को बड़े गौर से क्यो पढ़ते है?
एक एक संदेश आपके पास प्रिंट होकर आता है---है ना?
हम तो उस गली से निकलेंगे पर तुम मत जाना -क्यो मुनिवर?
आपने श्रावको को आलोचना के संदेशों को आगे फारवर्ड न करने व जरूरत पड़ने पर समूह से बाहर निकलने का निर्देश दिया---
पर आप तथा अन्य मुनि इन संदेशों को बड़े गौर से क्यो पढ़ते है?
एक एक संदेश आपके पास प्रिंट होकर आता है---है ना?
हम तो उस गली से निकलेंगे पर तुम मत जाना -क्यो मुनिवर?
सिरियारी औऱ आचार्य भिक्षु हर तेरापंथी की आस्था में सबसे ऊपर है
औऱ आप लोग सुरेंद्र सुराणा के प्रति द्वेष के चलते आचार्य भिक्षु से खेल गए----
सिरियारी में श्रावक न जाये---अर्थात सुराणा को प्लॉप करने के चक्कर मे आप यह भी भूल गए कि कार्यक्रम आचार्य भिक्षु के चरमोत्सव का है --आप अप्रत्यक्ष रूप से आचार्य भिक्षु को प्लॉप करने में लग गए?
औऱ यह भूल सबसे बड़ी आप लोगो से हो गयी है--शांति से एक मुनि के रूप में खुद को रख कर सोचिएगा ।
औऱ आप लोग सुरेंद्र सुराणा के प्रति द्वेष के चलते आचार्य भिक्षु से खेल गए----
सिरियारी में श्रावक न जाये---अर्थात सुराणा को प्लॉप करने के चक्कर मे आप यह भी भूल गए कि कार्यक्रम आचार्य भिक्षु के चरमोत्सव का है --आप अप्रत्यक्ष रूप से आचार्य भिक्षु को प्लॉप करने में लग गए?
औऱ यह भूल सबसे बड़ी आप लोगो से हो गयी है--शांति से एक मुनि के रूप में खुद को रख कर सोचिएगा ।
आपने एक बात बहुत अच्छी कही कि कर्मो का फल भुगतना पड़ता है---
इसमे सिर्फ यह जोड़ना चाहता हूँ कि साधु होकर जो साधुत्व न रख सके और साधु के परिधान का गलत उपयोग करे तो उसके कर्म आम श्रावक से भारी होते है और जो इन लोगो को बचाने की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कोशिश करे-अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करे वो भी संगीन गुनाह होता है।
इसमे सिर्फ यह जोड़ना चाहता हूँ कि साधु होकर जो साधुत्व न रख सके और साधु के परिधान का गलत उपयोग करे तो उसके कर्म आम श्रावक से भारी होते है और जो इन लोगो को बचाने की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कोशिश करे-अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करे वो भी संगीन गुनाह होता है।
कुमार श्रमण जी
हम जैसे लोग उस दर्द को लिखते है जो आम श्रावक के मन के सवाल होते है पर आप लोगो के इंगित आस्था की दीवारों से वो सामने नही आ पाते या दूसरे शब्दों में आप लोग उनको अपने सवाल कहने नही देते---धर्म संघ की उतरती बात कहना भी जुर्म करार दे देते है।
भले ही आप हम जैसों को निंदक,काली हांडी या औऱ भी कुछ कहे पर हम सच के प्रति समर्पित कलम के सिपाही है----
देश,समाज और धर्म संघ के प्रति अपनी जबाबदेही आपकी उपमाओं को धारण करते हुए भी निभाएंगे।
हम जैसे लोग उस दर्द को लिखते है जो आम श्रावक के मन के सवाल होते है पर आप लोगो के इंगित आस्था की दीवारों से वो सामने नही आ पाते या दूसरे शब्दों में आप लोग उनको अपने सवाल कहने नही देते---धर्म संघ की उतरती बात कहना भी जुर्म करार दे देते है।
भले ही आप हम जैसों को निंदक,काली हांडी या औऱ भी कुछ कहे पर हम सच के प्रति समर्पित कलम के सिपाही है----
देश,समाज और धर्म संघ के प्रति अपनी जबाबदेही आपकी उपमाओं को धारण करते हुए भी निभाएंगे।
शुभकामनाओ के साथ
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज
संर्पक सूत्र-72780-27381
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