गुणगान की भी हद होती है

जब एक आध्यात्मिक मंच पर आध्यात्मिक गुरु की उपस्थिति हो उस वक्त राजनीतिक हस्ती का सीमा से बाहर का गुणगान उचित नही लगता।
हम मुख्य मंत्री जी का स्वागत सत्कार आभार जरूर करे पर इतना नही कि आध्यात्मिक गुरु का अभिनंदन उसके सामने बोना लगने लगे।
हमारी यह कमजोरी है कि जब भी सियासत के लोग मंच पर आते है हम अति उत्साह में अपनी आध्यात्मिक मर्यादा,संस्कृति को भी भूल जाते  है।
आज कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में भी ऐसा ही हुआ।
बहुत शानदार गरिमायुक्त कार्यक्रम के आखिरी पड़ाव पर हम फिर चूक गए।
मुझे नही मालूम किसने क्या सोचा--- पर सीमा रेखा का उल्लंघन मुझे तो अखरा।

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
आपकी बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ- सनमजी!
गुरूदेव ही जब यह नहीं सोचते तो आयोजक को दोष देना उचित नहीं समझता हूँ। गुरुदेव खुद ही नेताओं को इतना महत्व देते हैं कि जैसे गुरूदेव ही नेतारूपी भगवान् से दर्शन करने के लिए लालायित हों। गुरूदेव ही आयोजक संस्था को प्रेरित करते हैं कि बड़े से बड़े नेताओं को बुलावो। वे नेताओं के आने में ही अपनी शान शौकत समझते है। यदि गुरूदेव उनको नहीं बुलवायेंगे तो प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि में खबर और फोटो कैसी छपेगी? ये भी कहते सुना है कि आप फिर कब आएंगे? गुरूदेव नेताओं से हाथ मिलाने हैं और हम श्रावक उनके चरण स्पर्श को तरसते हैं। गुरूदेव खुद ही अपना ओहदा नीचे गिरा रहे हैं। कहावत है- "बिण के मुंडा में लार पड़े तो जानी बापड़ा के करे।"