मेरे पास दो रास्ते थे-
मैं मोन साध लूं
और विज्ञापनों की कतार लगा लूं
और विज्ञापनों की कतार लगा लूं
या फिर सच को आवाज़ देकर
आम आदमी के दिल को सहला लूं।
आम आदमी के दिल को सहला लूं।
पहले रास्ते में
भौतिकता की फसल थी
चमकदार सी चमचमाती सड़क थी
खास लोगों की आँखों में प्रियता सी नजर थी
भौतिकता की फसल थी
चमकदार सी चमचमाती सड़क थी
खास लोगों की आँखों में प्रियता सी नजर थी
दूसरा रास्ता
कंक्रीला, उबड़ खाबड़ बेहद कठिन था
सच आहत था और संस्कृति पर संकट दिखा था
जो कहेगा सच उस पर
समाज विरोधी का बैनर सा टंगा था
इस रास्ते पर
आम आदमी का जख्मी स्वाभिमान पड़ा था
समाज संस्कृति की दीवारें हिल रही थी
पर श्रद्धा की आड़ में
और इंगित के नाम पर
हर दिन नयी चोट पड़ रही थी।
कंक्रीला, उबड़ खाबड़ बेहद कठिन था
सच आहत था और संस्कृति पर संकट दिखा था
जो कहेगा सच उस पर
समाज विरोधी का बैनर सा टंगा था
इस रास्ते पर
आम आदमी का जख्मी स्वाभिमान पड़ा था
समाज संस्कृति की दीवारें हिल रही थी
पर श्रद्धा की आड़ में
और इंगित के नाम पर
हर दिन नयी चोट पड़ रही थी।
मैंने दूसरा कठिन रास्ता चुना
आम आदमी की आवाज़ को सुना
और मैं विसंगतियों को ललकार रहा हूँ
मेरा विरोध किसी व्यक्ति से नहीं है
मेरा विरोध व्यवस्था की गलतियों से है
और इसके लिए मोन साधे
आम आदमी को मै जगा रहा हूँ
आम आदमी की आवाज़ को सुना
और मैं विसंगतियों को ललकार रहा हूँ
मेरा विरोध किसी व्यक्ति से नहीं है
मेरा विरोध व्यवस्था की गलतियों से है
और इसके लिए मोन साधे
आम आदमी को मै जगा रहा हूँ
उन्हें बता रहा हूँ कि
तुम न दुर्बल हो न लाचार हो
तुम तो व्यवस्था के असली आधार हो
समाज आम आदमी से बनता है
खास तो मंचों की शोभा बनाते है
पर यह उचित नहीं लगता
जब कुछ मुट्ठी भर लोग
समाज को अपनी मर्जी से चलाते है
तुम न दुर्बल हो न लाचार हो
तुम तो व्यवस्था के असली आधार हो
समाज आम आदमी से बनता है
खास तो मंचों की शोभा बनाते है
पर यह उचित नहीं लगता
जब कुछ मुट्ठी भर लोग
समाज को अपनी मर्जी से चलाते है
इसलिए उठो और कहो कि
बहुत हो गया--अब और मनमानी नहीं चलेगी
कुटिल सियासत की छद्म कहानी नहीं चलेगी
होगा वही ,जो आम आदमी की आवाज कहेगी
दौलत और रुतबे की और नादानी नहीं चलेगी
बहुत हो गया--अब और मनमानी नहीं चलेगी
कुटिल सियासत की छद्म कहानी नहीं चलेगी
होगा वही ,जो आम आदमी की आवाज कहेगी
दौलत और रुतबे की और नादानी नहीं चलेगी
कुछ लोग मुझे समाज विरोधी कह रहे है
उनकी आँखों में मैं खटक रहा हूँ
ज़मीर की गवाही के संग चला हूँ मैं
पर उनको लगता कि मैं भटक रहा हूँ
उनकी आँखों में मैं खटक रहा हूँ
ज़मीर की गवाही के संग चला हूँ मैं
पर उनको लगता कि मैं भटक रहा हूँ
मेरी कलम,मेरी जुबान
सच के साथ रहेगी-
जन सामान्य के लिए
मेरी आवाज़ रहेगी
गर जरूरत पड़ी तो
क्रांति के शोले भी दहकेगे
अब कलम के साथ
समाज,राष्ट्र हित कटार भी रहेगी।।
सच के साथ रहेगी-
जन सामान्य के लिए
मेरी आवाज़ रहेगी
गर जरूरत पड़ी तो
क्रांति के शोले भी दहकेगे
अब कलम के साथ
समाज,राष्ट्र हित कटार भी रहेगी।।
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