जो धर्म प्रभावना के पथिक है
वो सियासत के झूले झूला रहे है
कभी किसी को चढ़ा रहे है
कभी किसी को उतार रहे है-----
मर्यादा का महत्त्व सबके लिए जरुरी है-
आचार्य को आचार्य की
साधु संतों को संत समाज की
श्रावकों को अपने हिसाब की चिन्हित मर्यादा में रहना चाहिए।
आचार्य व् साधु समाज की जिम्मेदारी अधिक है क्योंकि उनकी भूमिका पथ प्रदर्शक की है --अगर वे स्वयं मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का मान नहीं रखेंगे तब श्रावक समाज को फिर कैसे कहेंगे?
जन सामान्य के मन में सवालो की ऐसी घुटन शायद पहले कभी न देखी गयी हो---
अगर कमांडर ही दबाब में हो तो सेना का शौर्य भी चूक जाता है---
अब समय श्रद्धा और इंगित के नाम पर मौन पट्टी बांधने का नहीं बल्कि विसंगतियों के कचरे को निकालने का है----
स्वच्छता अभियान की यहां प्रबल आवश्यकता है-----
संजय सनम
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