इल्ज़ाम जालिम होते है

ईनाम

इल्ज़ाम

जब ईनाम मिलता है तब कली कली खिल जाती है--

जब इल्ज़ाम लगता है तब पैरो से भी जमीन खिसक जाती है।

अगर बिन कसूर  भी मिल जाये तब चोट कुछ अधिक लगती है-

और तब वो ग़ुनाह करने का मन भी हो जाता है जिसके लिए अग्रिम भुगतान मिल गया।

कुछ ग़ुनाह शायद तब ही हो जाते होंगे---जब बेगुनाह पर भी कुछ इल्ज़ाम डाले जाते होंगे।

इसलिए  बे वजह इल्ज़ाम गर मिले तो धैर्य रखें---गुनहगार बनने से बचे---

और गुनाह पर इल्ज़ाम लगे तब उसका प्रायश्चित करे।

नोट---बहुत गंभीरता से न पढ़े--पर ऐसा हो गया हो तब गंभीरता से जरूर रहे---अपने दिल की बात को सद्भावना के साथ भी मज़ाक में न कहे--जाने कब कोई क्या  समझ ले?

अधिक खुलने से बचे--सामने वाले के खुलेपन को गंभीरता से न ले--

कोई आप को आपकी सीमा रेखा समझाए उससे पहले एक बड़ी मोटी रेखा खुद ब खुद खींच ले---

अन्यथा इल्ज़ाम लगने का बोझ बहुत खतरनाक सा हो सकता है--व्यथित कर सकता है---

इसलिए  भावनाओं की अति निकटता से बचे--- अन्यथा  कभी भी आपका विनोद विरोध के रूप में वापिस लौट सकता है।

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