भाषा देखिये इनकी?

सियासत के लौटे जब शब्दों की मोज़ो से खेलते है तब बड़े नागवार से लगते है---वोट बैंक पर गिद्ध की तरह आँख लगाये ये लोग जब भाषा की  मर्यादा को तोड़ते दिखते है तब भी बड़े अखरते है।

चुनावी भाषण में एक दूजे पर तंज कसने वाले,एक दूसरे के जानी दुश्मन से दिखने वाले जब असल जिंदगी के यार दोस्त से मिलते दिखते है तब उन कानों व् आँखों को अखरते है जिसने इनको देखा और सुना।

फिल्मो की पटकथाओं में अभिनेता अभिनेत्री के डबल रोल सुने देखे गए है पर ये राजनेता सियासत की इस फिल्म में एक साथ न जाने कितने रोल निभाते है उसकी कल्पना भी आसान नहीं है और उसमें से इनका  एक खास किरदार है जनता को बेवकूफ एक बार नहीं बल्कि बार बार बनाना और ये बखूबी बनाते है। 

जब चरित्र  चित्रण ही सियासत का ऐसा है तब इनकी भाषा की परिभाषा कोन कहे? क्या मालूम सियासत की फिल्म के ये ही डायलॉग इनके बोलने के लिए लिखे हुए होंगे फिर वो चाहे देश के प्रधानमंत्री को आतंक वादी ही क्यों न कह दे? कोई किसी को पप्पू कह कर बुलाता है तो कोई टूटी साइकिल के कल  पुर्जे  मंगवाता है
और एक को रोकने के लिए बहुत सारे दल एक हो जाते है तब इनकी असली मानसिक स्थिति का ग्राफ  खुद दिख जाता है।

न शब्दो में शालीनता,न वादों की गारंटी बस वोट लेने के लिए कुछ भी कह देंगे और बाद में मैदान से नदारद।
सियासत का यह चेहरा देखने तक की इच्छा न हो शायद फिर भी दिखता है और बड़ी बेशर्मी के साथ वोट मांगने फिर आ जाता है।

यह इस सियासत की व्यथा की कथा है।

संजय सनमhttps://www.youtube.com/channel/UCHOjYiYmMO41j34qbDPpXFA

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