शालीनता तक भूल बैठे है?

देश  के 5 राज्यो के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश अभी गर्म चल रहा है क्योंकि देश का सबसे बड़ा प्रदेश और उसकी जीत हार का देश की राजनीति पर प्रभाव जो पड़ता है-सियासत के सभी दल जो उत्तर प्रदेश की जड़ से या तने या फिर किसी न किसी शाखा या फूल से जुड़े हुए है-वे अपना पूरा दम लगाकर कुछ हासिल करने के लिए कुछ भी कहने या फिर कहने से नहीं कतरा रहे है।

जुबानी जंग का बाजार गर्म है-तंज कसने की चाह में शालीनता की रेखा का प्रायः सब दल अतिक्रमण कर रहे है और अफ़सोस इस बात का कि उनको गलत शब्दो के प्रयोग का कोई अफ़सोस तक भी नहीं है।

एक शब्द को पकड़ कर तत्कालीन मुद्दा बनाने में पारंगत यह सियासत इनकी आड़ में अपनी भूतकाल की खामियों पर कपड़ा  डाल रही है और भेड़ चाल में चल रही जनता अपने गंभीर सवालो को भूलकर सियासत की चुटकियों की चौपालों में चर्चा कर रही है--यह इससे भी बड़ा दुखद है।

क्योकि जब मालिक लापरवाह होता है तब उसके यहाँ काम करने वाले असल के मालिक बन जाते है और जो वास्तव में कभी मालिक हुआ होता है उसे सिर्फ हस्ताक्षर का मालिक बना देते है।
यही तो हो रहा है भारत की जनता से---जो मालिक होकर भी बदतर हालात में है और उसके यहाँ काम मांगने आये उसके बाप से बन गए है।

अब शालीनता का तकाजा फिर कैसे रहे जब गधो की बाते चुनावी तंज में हो जाये और देश के प्रधानमंत्री को कोई आतंक वादी तक कह जाए या फिर चुनाव में कब्रिस्तान और शमशान तक आ जाए--तब एक सवाल उठता है कि सियासत में इस कुटिलता को क्या अमरत्व का वरदान प्राप्त है --ये खत्म क्यों नहीं होती?₹

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