मेरा पत्र 9 15 फरवरी 2017

मै आचार्य श्री महाश्रमण जी को भगवान नहीं मानता तो क्या इसके लिए तथाकथित संघ निष्ठा  व्  आचार्य महाश्रमण जी को भगवान मानने वाले लोगो की जमात में  से किसी को काटने,मारने,ऊपर पहुँचाने वाले धमकी देने का यह लाइसेंस आज का तेरापंथ देता है?

मैं शब्दों की दुनियां से जुड़ा हूँ--पत्रकारिता के स्वस्थ उसूलों से बंधा हूँ अगर समाज के जन सामान्य की व्यथा को सवाल के रूप में शालीनता से आवाज दे रहा हूँ तब भी क्या मुझे मारने,काटने,व् ऊपर पहुँचाने की धमकी देने का अधिकार किसी को है?

आप को जो भगवान लगे -आप उन्हें भगवान कहिये,मानिये यह आपकी आज़ादी है -मुझे जो भगवान लगे-जिनमे मेरा मन रमे -मै उनको भगवान मानु यह मेरी आज़ादी है---
कोई दूसरा कोन होता है अपनी मर्जी को धमकी से लादने वाला---
मुझे आचार्य भिक्षु भगवान् लगते है --आचार्य महाश्रमण जी नहीं लगते---
यह मेरी धर्मिक स्वंत्रता है कोई होता कोन है मुझ पर यह थोपने वाला।

कल रात को एक धमकी मेरे कल के व्हाट्स एप पर दिए सन्देश को पढ़ने के बाद मिली--एक महिला ने चिल्ला चिल्ला कर पहले गुंडई अंदाज में काटने,मारने,व् ऊपर पहुँचाने की धमकी दी।
जब मैंने अपने अंदाज में जबाब दिया तब एक पुरुष ने भी बात की और यह कहा कि आपका नम्बर बहुत जगह दे दिया गया है अब ऐसे फोन और बहुत आएंगे---

मैंने कहा कि आपने अपना काम कर दिया अब हमारा जबाब भी देख लीजिए और उस वक्त भावनात्मक रूप से मैंने माँ भगवती के नाम से उनको श्रापित कर दिया कि इसी पल से अब आपका वक्त बदलता देखिये और बर्बादी की कहानियाँ होती देखिये।

तब उस महिला ने फिर फोन लिया पर अब उनका अंदाज बदला हुआ था और बार बार भाई साहिब भूल हो गई-माफ़ कर दीजिए,हम आपको जान नहीं पाए।

इस दौर में शायद लाइन कट गई थी फिर वहां से फोन आया अब एक किशोर की सी आवाज थी और वो गिड़गिड़ाते माफी मांग रहा था कि अंकल बहुत बड़ी गलती मुझसे हो गई जो मैंने आपको धमकी दी--आप वो श्राप वापिस ले लीजिए-मै अभी 15 वर्ष का हूँ मुझे माफ़ कर दीजिए।

मैंने उसको कहा कि तुम जैन हो,तेरापंथी हो और अभी 15 वर्ष की उम्र में गुंडई कर रहे हो--तुम साधु संतों की सेवा करते हो उनके प्रति सम्मान रखते हो तब क्या साधु संत से आपने यह सीखा है? तब वो फिर माफी मांगने लगा।
मैंने कहा कि जो दिल से आह निकली है उसको अब वापिस लेना मेरे हाथ में नहीं है पर तुम्हारी माफी अगर लिखित में व्हाट्स एप पर आती है तब में अभी पुलिस कार्रवाई नहीं करूंगा।

तब उसने कहा कि मेरे लिखित को आप व्हाट्स एप  में ग्रुप में तो नहीं दोंगे-मेरा नाम और तो नहीं दोगे।

मैंने उससे यह वादा किया कि उसका विवरण सार्वजनिक रूप से कही नहीं जायेगा और वो मैं अभी भी निभा रहा हूँ।

यहाँ पर मै यह सोचने को विवश हूँ कि धमकी की आवाज तो महिला की थी पर इस किशोर को आगे कर दिया गया लगता  है खैर।
यह तो था घटनाक्रम और अब मेरे सवाल।

पत्रकारिता के करीब 15 वर्ष के सार्वजनिक जीवन में मुझे प्रलोभन तो कई बार मिले है और जिन्हें शालीनता से नकार कर आगे बढ़ा हूँ यह धमकी और वो भी एक जैन और तेरापंथी परिवार से मिलना इसलिए दुखद है कि यह तेरापंथ संघ की वर्तमान स्थिति का आंकलन करने के लिए एक आइना दिखा रहा है---

सवाल यह है कि धर्म संघ व् संघ पति के नाम से क्या यह कट्टरवाद को इंगित नहीं करता--

सवाल यह है कि एक तेरापंथी परिवार की महिला पुरुष व् किशोर अगर इस तरह के मांसाहारी शब्दो का इस्तेमाल कर रहे है तब उनके संस्कार,आचरण कैसे होंगे?
क्या यह धार्मिक आतंकवाद नहीं है---?

उनका कहना था कि आपने आचार्य श्री महाश्रमण जी से सीधे संवाद क्यों नहीं किया?
मैंने कई पत्र आचार्य श्री महाश्रमण जी को निवेदित किये पर एक का भी ज़बाब नहीं--जब उन्होंने मेरे शब्दों को जो आम जन सामान्य के सवाल कर रहे थे उनको भी रद्दी में फेंक दिया तब क्या वो मुझे वक्त देते--?

अगर उनका आदेश आया होता और मैं उनके दर्शनों के लिए नहीं गया होता तब यह मेरी भूल हो सकती थी पर उस वक्त मैं कलम का धर्म निभाता-जब तक आचार्य श्री से संवाद नहीं होता तब तक इन विषयों पर सार्वजनिक रूप से मै कुछ नहीं लिखता।

क्या सच को शालीनता से लिखने के लिए मुझे तथाकथित संघ निष्ठो की अनुमति लेनी होगी?

तब ध्यान से सुन लीजिये--

मेरे देश का संविधान शालीनता से अपनी बात कहने लिखने की मुझे आजादी देता है इसलिए न तो मैंने कल किसी से पूछा है--न आज किसी से पूछ रहा हूँ  और न ही कल किसी से पूछुंगा।

एक पत्रकार,कवि होने के नाते कलम धर्म मेरे लिए सर्वोपरि है--मैंने हमेशा आम जनता की आवाज उठाई है और जब तक आखिरी सांस चलेगी तब तक मैं अपना यह धर्म निभाउंगा।

मौत तो एक बार आनी है इसलिए अपने दायित्व को निभाते हुए ही मैं मरना पसंद करूँगा-क्योकि मुझे आशंका  है मेरी जान की सुपारी भी दी जा सकती है पर यह याद रखियेगा कि मेरी जिंदगी अनैतिक मुखोटो के लिए जितनी खतरनाक है उससे अधिक कयामत मेरी मौत बरपा देंगी।

मुझे मारने की कोशिश करने वालो अपनी जिंदगी के इंतजाम पहले कर लेना क्योकि मेरी जिंदगी अगर चिंगारी है तो मेरी मौत शोला बनकर  दहकेगी।

मैं इस देश के संविधान,सरकार, प्रशासन और न्याय व्यवस्था से यह अनुरोध करता हूँ कि भविष्य में अगर मेरे व् मेरे परिवार के साथ इस तरह की कोई दुर्घटना हो तो 14फरवरी 2017 को रात्रि 9 बजे के आसपास आये उन दो नम्बर से फोन और  एक नम्बर से  आया माफीनामा उनको व् जिस दिन मेरे साथ कोई घटना हो उस दिन के प्रसंग से जुड़े लोग व्  साथ में आचार्य श्री महाश्रमण जी की धर्मिक कट्टरवाद की यह अप्रत्यक्ष भूमिका को दोषी माना जाये।

क्योकि कल की धमकी आचार्य श्री महाश्रमण जी पर कोई बात अर्थात सवाल उठाने पर ही मिली है।

मैंने यह जानकारी सीधे आचार्य श्री को ही दी होती अगर उन्होंने मेरे एक पत्र का भी जबाब भिजवाया होता इसलिए संघपति होने के नाते अगर उनके नाम से कोई धमकी मिलती है तब अप्रत्यक्ष रूप से से यह जबाबदेही उनकी होती है।

अब आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रति मेरे मन में किंचित मात्रा में भी श्रद्धा नहीं बची है फिर भी मेरे देश का संविधान मुझे स्वाभिमान से जीवन जीने का अधिकार देता है।

अब देखना यह है कि मेरे संवैधानिक अधिकार के सामने आता कोन है।

आभार।

संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
संर्पक सूत्र-7278027381

टिप्पणियाँ