मेरा पत्र 4-----

श्रीमान विनोद जी
साधू साध्वी समाज न सिर्फ आत्मकल्याण के लिए बल्कि जन कल्याण के लिए अपना घर परिवार ,भोग विलास छोड़ते है।
संयम की राह पर चलते हुए अपने प्रारब्ध के कर्मो की तलपट को  ठीक करते है और दुनियां को मार्गदर्शन देंते है।
साधू साध्वी समाज धर्म के उसूलों के ही पथिक होने चाहिए-वो सियासत की कुर्सियो को तय करने वाले नहीं होने चाहिए।
उनकी भूमिका अगर कही दिलो में दीवार है तो उसको मिटाने की जरूर होनी चाहिए पर संस्थाओं के पदा धिकारी बनाने की कतई  नहीं होनी चाहिए।
मुझे यह मालूम नहीं कि धर्म सम्मत  क्या है? पर मेरा मन कहता है कि हमारे शास्त्रो ने भी साधू साध्वी समाज व् संघपति को इसकी इजाजत सम्भवतया नहीं दी होगी।
हमारे मार्गदर्शक ही जब सियासत के मोहरे बन रहे है और उनके सरल हृदय का गलत इस्तेमाल कुछ लोग कर रहे है तब ये सवाल उठ रहे है  ।इसलिए आम जन सामान्य के मन  की व्यथा को समझना अत्यंत जरुरी है।
मुझे आज आचार्य श्री तुलसी का कुशल प्रबन्धक वाला व्यक्तित्व व् अपनी भूल को स्वीकार कर आगे सुधार कैसे हो यह सुझाव मांगने वाला वो आकर्षक कृतित्व याद आ रहा है।


आचार्य श्री तुलसी जैसा कुशल प्रबंधन,व् अपने निर्णय को बदलने की क्षमता, अपनी भूल को जान लेने के बाद मान लेने की मानसिकता--अब ये विशिष्टता क्यों नहीं दिख रही?

यह सच है कि मैंने न तो आगम  को पढ़ा है और न ही हमारे धर्म संघ के शास्त्रों को----पर सवाल यह है कि जो  उस राह के पथिक है वो मुझे इतना कह दे कि उन शास्त्रो में आचार्य व् साधू साध्वी समाज को पदाधिकारी बनाने के लिए मंगलपाठ सुनाने व् धर्म संघ समाज की संस्थाओ को बनाने  के कार्य करने के लिए कही भी कहां है?
अगर हां तो मुझे विवरण बताये -- मै उन शास्त्रों को वंदन करते हुए सब से विनय पूर्वक माफी मांगते हुए अपने तर्क को वापिस ले लूंगा।
अगर नहीं तो फिर संघ पति को अपनी भूमिका बदलने का निवेदन करूँगा।
मुझे विश्वास है कि संयम की राह पर चलाने वाले हमारे शास्त्रो के आचारों ने साधू साध्वी समाज को सियासत की राह से कोसो दूर रहने के लिए ही कहां होगा--
नीति की भूमिका सियासत को भी पाक पवित्र  कर सकती है पर उसके लिए चाणक्य बनना पड़ता है।
मै फिर से आम जन सामान्य के मन की बात पर आते हुए यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जब जब कुछ खास लोगों के चश्मे से आम जन सामान्य की भावनाओं को दरकिनार किया जाता है तब इसका परिणाम बहुत भयावह हो जाता है।
धर्म संघ की असली ताकत आम श्रावक है अगर इनका धीरज जबाब दे गया तब आचार्य भिक्षु जी के तेरापंथ व् आज के तेरापंथ पर सवालों की तकरीर बहुत मुश्किल कर सकती है।
प्रबुद्ध श्रावकों की यह जबाबदेही है कि आम जन भावना का सम्मान करते हुए अपनी भूमिका का निर्वाह करे।

संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
संर्पक सूत्र-7278027381

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