सियासत का चुनावी तवा गर्म--

नशे का राज करने वालों का संग भाजपा पर भारी पड़ सकता है।


दोस्त के गुनाह की सज़ा भाजपा भुगतने के लिए तैयार दिखती है--


दोस्ती जब सियासत निभाती है तब वो जनता के ज़ख्मो को अनदेखा क्यों कर जाती है?

चुनाव की यह बाजी कौन जीतेगा?

प्रश्न बड़ा यह नहीं है----जनता की नजरों से उतरने का अर्थ बड़ा है।

पर ये सियासत इसको भला कब समझती है?

संजय सनम








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